जर्जर इमारतों की संख्या में वृद्धि की संभावना, खतरे में रहिवासियों की जान
हादसा होने की संभावनाएं बढ़ी
■ विनोद मिश्रा
भायंदर :- मीरा भायंदर मनपा द्वारा शहर के 1648 संदिग्ध जर्जर इमारतों को उनके स्ट्रक्चरल ऑडिट (संरचनात्मक परीक्षण) की जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने का नोटिस दिया गया है. जिसमें से 519 इमारतों के ही स्ट्रक्चरल ऑडिट रिपोर्ट अब तक मनपा में सादर की गई है. मनपा में सादर की गई रिपोर्ट के आधार पर शहर के 29 इमारतों को सी-1 श्रेणी की अति जर्जर इमारत (रहने योग्य नहीं) घोषित कर उसे तोड़ने की नोटिस दी गई है. बाकी बचे 1129 इमारतों की स्ट्रक्चरल ऑडिट रिपोर्ट आने के बाद अति जर्जर इमारतों की संख्या में वृद्धि होने की संभावना है. बरसात के मौसम में अति जर्जर इमारतों के गिरने या हादसा होने की संभावना अधिक होती है. जिससे जानमाल को क्षति पहुंचती है. इससे पूर्व भी शहर अति जर्जर इमारतों के हादसाग्रस्त होने की घटनाएं घटित हो चुकी है. इस पर अंकुश लगाने और जानमाल की सुरक्षा की दृष्टि से मनपा आयुक्त संजय श्रीपतराव काटकर के निर्देश पर शहर के 30 वर्ष या उससे जर्जर इमारत में रहने वाले नहीं कराना चाहते स्ट्रक्चरल ऑडिट की मुख्य वजह बताई जा रही है।
इन क्षेत्रों की अधिकांश इमारतें अति जर्जर
बता दें कि 1980 के दशक में मुंबई शहर में रहने के घर महंगे होने जगह उपलब्ध नहीं होने जैसे अनेक कारणों से लोग वहां से स्थानांतरित होकर मुंबई के आस पास के नगरों जैसे मीरा भायंदर, वसई विरार, कल्याण डोम्बिवली, ठाणे भिवंडी आदि क्षेत्रों में विस्थापित होने लगे. मुंबई में चाल में रहने वाले लोग अपने घर बेच कर यहां इमारतों में घर खरीदने लगे. इस काल में सैकड़ों की संख्या में नई इमारतें बन कर खड़ी हो गई. ग्राम पंचायत और उसके बाद नगर परिषद के कार्यकाल में बन रहे इमारतों पर किसी प्रकार का नियंत्रण या अंकुश नहीं था. बिल्डर, ग्राम पंचायत- न. पा अधिकारी और स्थानीय राजनितिक नेताओं की मिलीभगत से सैकड़ों अवैध इमारतों का निर्माण किया गया. जिसमे इमारतों के निर्माण का स्तर और नियम दोनों की जमकर अनदेखी की गई, जिससे 1980 से 2002 के मध्य बनाई गई अधिकांश इमारतें आज अति जर्जर अवस्था की हो गई है.
मीरा भायंदर शहर के जर्जर और धोखादायक इमारतों को मनपा प्रशासन द्वारा संरचनात्मक ढांचे का लेखा-परीक्षण (स्ट्रक्चरल ऑडिट) के आदेश दिए जाने के बावजूद कई इमारतों के रहिवासियों द्वारा लेखा परीक्षण नहीं कराने का मामला सामने आया है।
संरचनात्मक लेखा परीक्षण में लगने वाला शुल्क और परीक्षण कराने के बाद अगर संबंधित इमारत को घोखादायक घोषित कर दी गई तो इमारत खाली करने का डर इसके पीछे करीब एक दशक में खाली कराकर तोड़ी गई कई इमारतों का पुनर्निर्माण आज तक नहीं हुआ है. जिससे उन इमारतों में रहने वाले रहिवासी आज भी अपने आशियाने से वंचित हैं।
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