Wednesday, October 1, 2014


 
                                अभिधान राजेंद्र कोष का गुजरती मैं सरल अनुवाद 
                                        
                                                 (दीपक जैन/राकेश दुबे)

 मुंबई-अपने धर्म के ज्यादातर शास्त्र संस्कृत भाषा मैं लिखे गए है. लेकिन संस्कृत भाषा के ज्ञान के आभाव मैं बहुत से लोग इन शास्त्रो का अध्यन नहीं कर सकते है.आज की युवा पीढ़ी गुजरती लिख पढ़ नहीं सकती तो संस्कृत का ज्ञान तो बहुत दूर की बात है. प्रत्येक व्यक्ति को पग पग पर उपयोगी होहो इसी उद्देश्य को ध्यान मैं रखकर श्री अभिधान राजेंद्र कोष को अनुवाद करने की शुरुवात की गयी जिसकी रचना 19वी सदी मैं परम पूज्य आचार्य श्री राजेन्द्रसूरि स्वरजी म.सा. ने की थी.
परम पूज्य गच्छाधिपति आचार्य श्री जयन्तसेन्सुरिस्वरजी म.सा.के आज्ञानुवर्ती मुनिराज श्री वैभवरत्न विजयजी म.सा.ने बताया किक़ि 114 वर्ष पूर्व इस महान ज्ञान तीर्थ की सात भागो मैं करते समय उनकी तीव्र इच्छा थी की इस ज्ञान का लाभ हर मानव को अपने जीवन मैं मिले।आज बहुत काम लोग देवभाषा संस्कृत को जानते है जिसके चलते इस कोष का उपयोग करना मुश्किल हो गया है और इसी बात को ध्यान मैं रखते हुए इसे सरल गुजरती भाषा मैं अनुवादित कर प्रथम संस्करण प्रकाशित किया गया है.
गुजराती  मैं विवेचन करनेवाले मुनि वैभवरत्नजी कहते है कि साढ़े चार लाख से ज्यादा श्लोक लिखे गए है,और यह सामान्य व्यक्ति से लेकर विद्वान गुरु भगवन्तो,पंडितो सभी के लिए बहुत ही उपयोगी है.आज के कम्प्यूटर युग मैं भी जो कार्य संभव नहीं उसे 100 साल पहले आचार्य राजेन्द्रसुरिस्वरजी म.सा. ने कर दिखाया।इस कोष मैं जीवन को सफल व उपयोगी बनाने के लिए संस्कृत श्लोको के साथ गुजरती भाषा मैं धार्मिक स्वरुप से इसका अर्थ समझाया गया है.
वैभवरत्नजी ने कहा की ज्ञान और ज्ञानी पर ही समाज की संस्कृति निर्भर है.अपनी परंपरा को युवा पीढ़ी तक पहुचने के उद्देश्य से ही श्री अभिधान राजेंद्र कोष का गुजराती मैं अनुवाद किया गया है.वैसे यह जैन कोष है परन्तु यह प्रत्येक मानव के जीवन मैं उपयोगी हैं.कोष की प्रति हेतू www,rajendrasuri.net पर संपर्क करे          












































































































































































































































































लाभ 





























































































































































































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